तीसरे पहर की नींद…!

वो तीसरे पहर की नींद
और किवाड़ की झिर्री
से आती हुई हवा
साथ ले आती है धुप की
खुश्बू और चिड़ियों का
आवारापन मेरे कानों तक

वो दलहान में टपकती बूँदें
और टूटी कड़ियों में बढ़ती
हुई दीमक
सब मेरी रियासत का हिसाब
देंगे ज़मानों तक

ख्वाब जो जेबों में भरकर
सोये थे
हर करवट पे खनखनाते हैं
गिरते हैं बिखर जाते हैं
कुछ तो रेंगते हुए भिटारों
में घुस जाते हैं

किसी ने जोर से थपथपाया
था या किसी ने आवाज़ दी
थी…जो अब नींद टूटी है
पलकों पे रक्खा ख्वाओं का
वो आखिरी टुकड़ा भी टूट
कर बुरादा हो गया है

अब तो चुभन है टुकड़ों की
आँखों के कोनों में
और फिर से एक शैलाब मेरे
होठों को छूता हुआ
ढुलका और पानी हो गया है |
~ विनय

1 Comment

  1. Nice deep thoughts.

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